अब तक एनाबॉलिक स्टेरॉयड का इस्तेमाल सिर्फ़ एलीट ऐथलीट्स तक सीमित था. लेकिन अब परफॉर्मेंस बढ़ाने वाली दवाओं का इस्तेमाल युवा पुरुषों में चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुका है.
ये एक प्रभावशाली डॉक्यूमेंट्री है, जो एक बढ़ती हुई चिंता को सामने लाती है- परफेक्ट बॉडी को लेकर युवाओं का जुनून और उसे पाने के लिए परफॉर्मेंस बढ़ाने वाले पदार्थों का बढ़ता इस्तेमाल. जो कभी सिर्फ़ एलीट प्रोफेशनल खेलों तक सीमित था, वो अब बॉडीबिल्डिंग के सपने देखने वाले किशोरों और युवा पुरुषों में आम हो चुका है. इसके नतीजे गंभीर हैं.
ये फ़िल्म मर्दानगी और सुंदरता के मौजूदा मानकों पर सीधा सवाल उठाती है और वैश्विक मसल-बिल्डिंग इंडस्ट्री के अंदरूनी तंत्र को गहराई से दिखाती है. एक इन्वेस्टिगेटिव फील्ड स्टडी की तरह बनाई गई ये फिल्म शरीर के परफेक्शन की इस दौड़ से जुड़े सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और शारीरिक जोखिमों को उजागर करती है.
ख़ुद अपनी कमजोरियों को आधार बनाकर फिल्ममेकर एक ऐसी दुनिया की बेहद निजी झलक दिखाते हैं, जो अक्सर लोगों की नज़र से ओझल रहती है. साथ ही वो एक उभरते हुए जनस्वास्थ्य संकट की व्यापकता को भी सामने लाते हैं. फ़िल्म का नज़रिया जितना बेबाक है, उतना ही संवेदनशील भी. ये उस सिस्टम को दिखाती है, जो शरीरों को एक तय मानक में ढालता है, लिमिट्स को लगातार पुश करता है और युवकों को अपने ही ख़िलाफ़ एक ख़तरनाक दौड़ में धकेल देता है.
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